सनातन धर्म (वैदिक संस्कृति) में सूर्य-पंचायतन पूजा की विशेषताएँ-पंचायतन पूजा वह परंपरा है जिसमें पाँच मुख्य
देवताओं का सामूहिक रूप से पूजन किया जाता है।
इसमें सूर्य पंचायतन से आशय उस पूजा-व्यवस्था से है जिसमें सूर्य देव प्रमुख देवता होते हैं और अन्य चार देवता
उनके साथ पूजित होते हैं। यह व्यवस्था आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित बताई जाती है ताकि सम्पूर्ण समाज में एकता
और समन्वय बना रहे।
सूर्य-पंचायतन की प्रमुख विशेषताएँ-१. सूर्य देव को “आदि देव” के रूप में माना जाना, सूर्य देव को जीवन, ऊर्जा,
स्वास्थ्य और शक्ति का मूल स्रोत माना गया है। इसलिए सूर्य पंचायतन में सूर्य देव की प्रधानता रहती है। २. पाँच
देवताओं की सामूहिक पूजा-सूर्य पंचायतन में सूर्य देव के साथ सामान्यतः यह पाँच देवता पूजित होते हैं:-१. सूर्य
– प्रधान, २. गणेश, ३. देवी (दुर्गा/लक्ष्मी/सरस्वती), ४. शिव, ५. विष्णु, इससे सभी प्रमुख उपासना-पंथ एकत्र
होकर एक ही पूजा में सम्मिलित होते हैं। ३. समन्वय और सर्वसमावेशी धर्म की अभिव्यक्ति- पंचायतन परंपरा का
उद्देश्य किसी एक देवता की श्रेष्ठता सिद्ध करना नहीं, बल्कि यह मान्यता स्थापित करना है कि सभी देवता एक ही परम
सत्य के विभिन्न स्वरूप हैं। ४. सूर्य को ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक-सनातन धर्म में सूर्य देव चिदानंद ब्रह्म
के प्रत्यक्ष प्रतीक माने जाते हैं। वे—समय के नियंता, जीवनदाता, कर्म, तप, साधना और ज्ञान के प्रतीक—के रूप में
देखे जाते हैं।
५. गृहस्थ और योग–ध्यान साधना में उपयोग-सूर्य-पंचायतन पूजा का विशेष महत्व है— सूर्योपासना (सूर्य नमस्कार,
गायत्री मंत्र) आयुर्वेद और स्वास्थ्य. ध्यान (सौर मंडल की ध्यान साधना), गृहस्थ जीवन में ऊर्जा और संरक्षण ६.
वैदिक और पुराणों में उल्लेख-ऋग्वेद, यजुर्वेद, मार्कण्डेय पुराण, सूर्य पुराण आदि में सूर्य उपासना और उससे
संबंधित देवमंडल का स्पष्ट वर्णन मिलता है। ७. मूर्तियों/शिलाओं के लिए विशेष व्यवस्था- पंचायतन पूजा में पाँच
शिलाओं या मूर्तियों को मंडल के रूप में व्यवस्थित किया जाता है—केंद्र में सूर्य, चारों दिशाओं में अन्य चार
देवता। सूर्य पंचायतन सनातन धर्म की वह पूजा-प्रणाली है जो सूर्य को केंद्र में रखकर पाँच प्रमुख देवताओं की
उपासना का समन्वित, सर्वसमावेशी और सामूहिक रूप प्रस्तुत करती है। यह परंपरा धार्मिक एकता, ऊर्जा, स्वास्थ्य,
ज्ञान और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक मानी जाती है।
सौर धर्म का ऐतिहासिक विकास-
(क) वैदिक युग -ऋग्वेद में सूर्य को— “सविता” (प्रेरक) “विवस्वान” (प्रकाशक) “मित्र” (बंधु) “पूषा” (पालनकर्ता)
कहा गया है।सूर्य सूक्तों में सूर्य को— ऋत (cosmic order) का रक्षक और प्राण (life-force) का स्रोत माना गया
है।
(ख) पुराणों में सूर्य -आदित्य-देव,सप्ताश्व वाहन,त्रिलोक–प्रदीप हनुमान के गुरु (सूर्य से विद्या प्राप्त की)
राम को युद्ध से पहले “आदित्य हृदय स्तोत्र” की उपदेश ये सब सूर्य की बहुआयामी भूमिका को दर्शाते हैं।
(ग) विश्व की अन्य सभ्यताएँ-सौर धर्म केवल भारत का विज्ञान नहीं— पूरी दुनिया में सूर्य की पूजा हुई:- मिस्र में
सूर्य-देव, रोम में सोल इन्विक्टस, ग्रीस में हेलिओस, जापान में अमतेरसु, इंका सभ्यता में इंटी, फारस में मिथ्रा
यह दर्शाता है कि मानव चेतना ने हर युग में सूर्य को जीवन के परम केंद्र के रूप में पहचाना।
आधुनिक संदर्भ में सौर धर्म की आवश्यकता-तेजी से बदलती दुनिया में मनुष्य प्रकृति से दूर हो रहा है, दिनचर्या
असंतुलित है, मानसिक तनाव बढ़ रहा है, पर्यावरण संकट बढ़ रहा है, ऊर्जा-स्रोत समाप्त हो रहे है, ऐसे समय में
“सौर धर्म” केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन नहीं देता, बल्कि एक व्यावहारिक जीवन-पद्धति प्रदान करता है:-
सूर्य-केन्द्रित दिनचर्या, प्राकृतिक ऊर्जा का सम्मान, संतुलित आहार और योग, पर्यावरण-संरक्षण, आत्मिक शांति और
मानसिक स्पष्टता
सौर धर्म कहता है— “प्रकाश में जियो, प्रकाश बनो, और अंधकार दूर करो।”
वैदिक व पौराणिक संदर्भ में सूर्य
वेदों में सूर्य का स्थान — ज्ञान और प्रकाश का आदिकेंद्र-
वेद मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं। इनमें सूर्य को केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि जीवन का
प्रेरक, चेतना का स्रोत और सार्वभौमिक व्यवस्था का धारक कहा गया है। ऋग्वेद में लगभग २५० से अधिक मंत्र सूर्य को
समर्पित हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि वैदिक ऋषियों ने सूर्य को ब्रह्मांडीय जीवन-स्रोत के रूप में पहचाना
था।
(क) सूर्य = ‘सविता’ — प्रेरक शक्ति, ऋग्वेद में सूर्य को “सविता” कहा गया है, जिसका अर्थ है: “वह जो गति देता
है, जो जगत को चेतना प्रदान करता है।” हर सुबह पूर्व दिशा से उठता सूर्य जीवन, बल, उत्साह और कर्म के लिए
प्रेरणा देता है। इसलिए वेद कहते हैं— “सविता देव हमें उत्तम कर्मों की ओर प्रेरित करें।”
(ख) सूर्य = ‘विवस्वान’ — प्रकाशदाता-सूर्य का प्रकाश केवल भौतिक प्रकाश नहीं; वह ज्ञान का प्रकाश भी है।
विवस्वान शब्द का अर्थ है—“जो अंधकार को दूर करे।” यह विचार बाद में उपनिषदों में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के रूप
में विकसित हुआ।
(ग) सूर्य = ‘मित्र’ — विश्वबंधु ऋग्वेद का "मित्र" रूप सूर्य की मांगल्य, करुणा, शांत स्वभाव पर आधारित है।
सूर्य दिनभर सबके लिए समभाव से प्रकाश देता है—न भेदभाव, न पक्षपात। यह सौर धर्म का नैतिक आधार है:- “सूर्य की
तरह निष्पक्ष और उदार बनो।”
(घ) सूर्य = ‘पूषा’ — पालनकर्ता, पूषा वह देवता हैं जो जीवों का पोषण करते हैं। सूर्य की ऊष्मा और किरणें पृथ्वी
पर भोजन की प्रत्येक प्रक्रिया का मूल हैं—बीज अंकुरण से लेकर वृक्ष और फसल तक।
सूर्य सूक्त — सौर चिंतन का शिखर- ऋग्वेद का सूर्य सूक्त सूर्य की दिव्यता, शक्ति, उष्मा और आशीर्वाद का अत्यंत
काव्यमय स्तोत्र है। इस सूक्त में सूर्य को— त्रिलोक-प्रदीप,प्राण का स्रोत,ऋत (cosmic order) का संरक्षक और
सत्य का प्रकाशक बताया गया है। वेदों में सूर्य के विषय में एक अत्यंत सुंदर विचार मिलता है— “सूर्य मात्र
प्रकाश नहीं, वह समस्त ब्रह्मांड को जोड़ने वाली शक्ति है।”
गायत्री मंत्र — सूर्य-ज्ञान का सार- विश्व का सबसे प्रसिद्ध मंत्र— गायत्री मंत्र—सूर्य-आधारित है।गायत्री
मंत्र का अर्थ (संक्षेप में): “हे दिव्य प्रकाश— हमारे बुद्धि-चक्षुओं को प्रकाशित करें, हमें सही मार्ग दिखाएँ,
और हमें सद्कर्म के लिए प्रेरित करें।” गायत्री मंत्र में जिस “सविता” की उपासना होती है, वह सूर्य ही है— लेकिन
उसका भौतिक स्वरूप नहीं, उसके भीतर स्थित चेतना, ज्ञान और प्रकाश-तत्त्व।
पौराणिक कथाओं में सूर्य — एक बहुआयामी देवता- पुराण सूर्य को एक अत्यंत शक्तिशाली, तेजस्वी और करुणामय देवता के
रूप में प्रस्तुत करते हैं।
(क) त्रिदेवों का तेज सूर्य में पुराणों में कहा गया है कि—ब्रह्मा का सृजन-तेज, विष्णु का पालन-तेज, महेश का
संहार-तेज —ये तीनों सूर्य में स्थित हैं। इस प्रकार सूर्य “एकता का प्रतीक” बन जाता है।
सप्ताश्व-रथ — सूर्य का प्रतीकात्मक विज्ञान- सूर्य के रथ को सात घोड़ों वाला बताया जाता है। यह शाब्दिक रूप से
समझने के लिए नहीं, बल्कि अत्यंत गूढ़ प्रतीक है। सात घोड़े = सफेद प्रकाश के सात रंग (VIBGYOR) वास्तव में
सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना है। ऋषियों ने वैज्ञानिक सत्य को “सप्ताश्व” के प्रतीक में व्यक्त किया।
दूसरा अर्थ — समय के सात विभाजन-दिन,रात्रि,सप्ताह,ऋतुएँ,वर्ष,युग,कल्प इस प्रकार सूर्य समय का निर्माता है।
सूर्य देव का स्वरूप — विज्ञान, मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता का मेल पुराण सूर्य के स्वरूप को विशेष रूप से
वर्णित करते हैं:-
१. सर्वव्यापी तेज सूर्य का तेज जागृति, उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक है।
२. वरद मुद्रा- आशीर्वाद देने वाला रूप मानव जीवन में आशा, शक्ति और प्रगति का संकेत है।
३. कमलासन- कमल सूर्य की ऊष्मा से खिलता है— यह शुद्धता और चेतना का प्रतीक है।
४. अचल-धृति (स्थिरता)- सूर्य का मार्ग स्थिर है, इसलिए उसे “धृतिमान” कहा गया है। यही कर्मयोग का आधार है।
सूर्य और ऋषि परंपरा- विष्वामित्र, कश्यप, भारद्वाज, अत्रि, वशिष्ठ जैसे महान ऋषियों ने सूर्य को ध्यान, योग,
साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का मूल माना है। उपनिषदों में सूर्य का वर्णन “ब्रह्म का प्रत्यक्ष स्वरूप” के रूप
में हुआ है— क्योंकि वह सबसे स्पष्ट, प्रत्यक्ष और जीवनदायी देवता है।
सूर्य-पूजन क्यों? — आध्यात्मिक मनोविज्ञान
पुराणों और वेदों में सूर्य-पूजन का उद्देश्य था— मनुष्य को प्रकाश, कर्म, साहस, ऊर्जा और नैतिकता से जोड़ना।
सूर्य-पूजन के तीन मनोवैज्ञानिक लाभ:
१. ऊर्जा-संवर्धन-प्रातःकाल सूर्य-दर्शन मस्तिष्क में सेरोटोनिन बढ़ाता है। यह आनंद, सक्रियता और आत्मविश्वास का
हार्मोन है।
२. अनुशासन- सूर्य प्रतिदिन समय पर उगता है। यह समयपालन का सर्वोच्च उदाहरण है।
३. सकारात्मकता- सूर्य प्रकाश का स्रोत है। यह मानसिक अंधकार को भी दूर करने का प्रतीक है। इसलिए सूर्य-पूजन एक
मनोवैज्ञानिक चिकित्सा की तरह भी कार्य करता है।
सूर्य से संबंधित प्रमुख पौराणिक प्रसंग-
(क) हनुमान की शिक्षा-हनुमान ने सूर्य को गुरु मानकर, उन्हीं से वेद, शास्त्र और व्याकरण का ज्ञान प्राप्त किया।
(ख) कर्ण सूर्यपुत्र- महाभारत के महान योद्धा कर्ण, सूर्य के तेज और दानवीरता का प्रतिबिंब थे।
(ग) आदित्य-हृदय स्तोत्र- राम ने रावण युद्ध से पहले, सूर्य देव का स्तोत्र सुनकर साहस, बल और मनोबल प्राप्त
किया।
(घ) संज्ञा और सूर्य की कथा सूर्य के तेज का दार्शनिक अर्थ है— सत्य के प्रकाश को सहन करने के लिए मनुष्य को
अपने भीतर स्थिरता और धैर्य चाहिए।
विश्व की अन्य सभ्यताओं में सूर्य-पूजा
सूर्य : वैश्विक चेतना का केंद्र- जब हम इतिहास की ओर देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि दुनिया की लगभग हर
प्राचीन सभ्यता ने सूर्य को सर्वोच्च देवता, जीवनदाता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के आधार के रूप में माना। यह
दर्शाता है कि सूर्य-पूजा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक मानव-सत्य रही है।सबसे रोचक तथ्य यह है
कि भले ही इन सभ्यताओं का आपस में कोई संपर्क न रहा हो,फिर भी सभी ने एक जैसी धारणाएँ विकसित कीं—सूर्य = जीवन
का स्रोत, सूर्य = शक्ति, सूर्य = समय का निर्माता, सूर्य = दिव्यता का आधार। यह मानव चेतना की प्राकृतिक
प्रवृत्ति को दर्शाता है— “जहाँ प्रकाश है, वहाँ देवत्व है।”
मिस्र सभ्यता — सूर्य देव ‘रा’
मिस्र की प्राचीन सभ्यता सूर्य-पूजा की सबसे प्रभावशाली मिसाल है। "रा (Ra) — प्राण और सृष्टि का देवता-"
मिस्रवासियों के अनुसार रा ने ही— संसार का निर्माण किया मनुष्यों को जन्म दिया, नील नदी के चक्र को संतुलित
किया, जीवन और मृत्यु के नियम बनाए रा को अर्ध-मानव, अर्ध-बाज़ के रूप में दर्शाया गया, सिर पर सौर चक्र (Sun
Disk) के साथ। "रा" के तीन दैनिक रूप मिस्रवासियों ने सूर्य के दैनिक गति को तीन रूपों में देखा:-
१. केतारी (Khepri) – उगता सूर्य,
२. रा – मध्याह्न का सूर्य,
३. अतु्म (Atum) – अस्त होता सूर्य,
ये तीनों रूप भारत के वैदिक विचार सविता—सूर्य—आदित्य से अत्यंत साम्य रखते हैं। सूर्य-नौका का रहस्य मिस्र की
मान्यता थी कि सूर्य प्रत्येक रात अंधकार के नीचे से नौका में बैठकर यात्रा करता है और प्रातः फिर उभरता है। यह
उनका प्रतीकात्मक तरीका था यह बताने का कि— प्रकाश हमेशा अंधकार को जीतता है।
ग्रीक सभ्यता — हेलीओस और अपोलो क संस्कृति में दो सूर्य-देव महत्वपूर्ण हैं:
(क) हेलीओस (Helios) - हेलीओस वह देवता थे जो आकाश में अग्नि-रथ चलाते थे, और दिन-रात का चक्र बनाते थे। उनके
सात घोड़े सूर्य के सात रंगों की तरह बताए गए— यहाँ भी वैदिक “सप्ताश्व” का अद्भुत साम्य दिखाई देता है।
(ख) अपोलो (Apollo)- ग्रीक संस्कृति में सूर्य को संगीत, चिकित्सा, भविष्यवाणी और ज्ञान का स्रोत माना गया है।
यह भारतीय सूर्य-देव के ज्ञान, औषधि और चेतना देने वाले रूप से मिलता-जुलता है।
रोमन सभ्यता — सोल इन्विक्टस (Sol Invictus) प्राचीन रोम में सूर्य-देव को कहा गया— “सोल इन्विक्टस” — अदम्य
सूर्य अर्थात्-“जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता।” रोमन सम्राट प्रतिदिन सूर्य को सैन्य शक्ति और साहस का स्रोत
मानकर प्रणाम करते थे। २५ दिसम्बर को 'सोल इन्विक्टस' का विशेष पर्व मनाया जाता था— क्योंकि यह वह समय है जब
सूर्य की उत्तरायण यात्रा प्रारंभ होती है। भारत में यही समय मकर संक्रांति से जुड़ता है। इससे स्पष्ट होता है
कि खगोलशास्त्र और सूर्य-आधारित समय-चक्र मानव सभ्यताओं के साझे तत्व थे।
जापान — सूर्य देवी ‘अमतेरसु’ (Amaterasu)- जापान की सबसे महत्वपूर्ण देवी अमतेरसु “सूर्य देवी” हैं।
(१) जापानी साम्राज्य का प्रतीक- जापान के ध्वज में लाल सूर्य-चक्र है— जिसे 'अमतेरसु' का रूप माना जाता है।
(२) प्रकाश की देवी- अमतेरसु को— व्यवस्था,प्रकाश,सामंजस्य, नैतिकता की देवी माना जाता है। यह वैदिक सूर्य के ऋत
(cosmic order) वाले स्वरूप से समान है।
(३) गुफा की कथा — प्रकाश और अंधकार का संघर्ष- एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक बार अमतेरसु अपमानित होकर गुफा में
छिप गईं और संसार अंधकार में डूब गया। जब देवताओं ने विनय, स्तुति और संगीत द्वारा उन्हें बाहर निकाला, तब फिर
से प्रकाश लौटा। यह कथा प्रतीक है कि— सूर्य ही जीवन और आनंद का मूल स्रोत है।
इंका सभ्यता — सूर्य देव ‘इंटी’ (Inti)- इंका सभ्यता (दक्षिण अमेरिका) अपने सूर्य केन्द्रित विज्ञान के लिए
प्रसिद्ध थी। इंटी — मानव जीवन का पिता। इंका लोग सूर्य को “जनक” और पृथ्वी को “जननी” मानते थे। उनका विश्वास था
कि मानव जाति सूर्य से अवतरित हुई है। इंटी का स्वर्ण मंदिर कुस्को स्थित “कोरिकान्चा” विश्व के सबसे भव्य सूर्य
मंदिरों में से एक था, जिसमें सूर्य की प्रतिमा पूर्ण स्वर्ण से बनी थी। क्योंकि सूर्य = तेज = स्वर्ण, यह विचार
भारत और मिस्र में भी समान है। सूर्य महोत्सव — इंटी रायमी, हर वर्ष २४ जून को “इंटी रायमी” उत्सव मनाया जाता
है— यह सूर्य की शक्ति और नए कृषि वर्ष का शुभारंभ माना जाता है।
मय सभ्यता — समय और गणित का सूर्य-आधारित चमत्कार- मय सभ्यता के लोग सूर्य की गति के महान खगोलशास्त्री थे।
(१) सूर्य-आधारित कैलेंडर उन्होंने ऐसा सटीक कैलेंडर बनाया जो आज भी वैज्ञानिकों को चकित करता है।
(२) खगोलीय वेधशालाएँ उनकी वेधशाला एल काराकोल सूर्य और ग्रहों की दिशा मापने के लिए बनाई गई थी।
(३) सूर्य = समय का स्वामी मय लोगों के अनुसार समय का चक्र सूर्य की गति के अनुसार चलता है— यह वही विचार है
जिसे भारत में “कालचक्र” कहा गया।
पारसी धर्म — ‘मिथ्रा’ और ‘अग्नि’ में सूर्य का प्रतिबिंब- पारसी धर्म में सूर्य का महत्व अग्नि के रूप में
विद्यमान है। पारसी अग्नि-मंदिरों में जलती अग्नि सूर्य का स्थलीय प्रतीक मानी जाती है। पारसी देवता मिथ्रा-
सत्य,अनुबंध,न्याय का प्रतिनिधित्व करते हैं— ये गुण भारतीय "मित्र" देव से अत्यंत समान हैं। यह दर्शाता है कि
मित्र/मिथ्रा परंपरा दोनों संस्कृतियों में सूर्य-आधारित थी।
उत्तर-यूरोपीय सभ्यताएँ — ‘सोल’ और ‘बाल्डर’- नॉर्डिक मिथक में सूर्य को देवी सोल कहा गया है। सोल एक स्वर्ण रथ
पर आकाश में यात्रा करती है। दूसरी ओर बाल्डर प्रकाश के देवता हैं— जो शांति, प्रेम और सुंदरता के प्रतीक हैं।
सूर्य के अर्थ को उन्होंने “जीवन की पवित्रता” से जोड़ा।
वैश्विक सूर्य-पूजा की संगति —समान तत्व
यदि इन सभ्यताओं की तुलना करें तो चार मूल आधार स्पष्ट होते हैं:
१. सूर्य = जीवन का स्रोत खाद्य, जलवायु, ऊर्जा और स्वास्थ्य—सब सूर्य पर आधारित हैं।
२. सूर्य = प्रकाश = ज्ञान = आशा = सत्य, दुनिया की हर संस्कृति ने यह समान सूत्र अपनाया।
३. सूर्य = समय और व्यवस्था ऋत (भारत), मा’त (मिस्र), और कोस्मिक ऑर्डर (ग्रीस)—ये सब एक ही सत्य का संकेत देते
हैं।
४. सूर्य = दिव्यता का प्रत्यक्ष रूप क्योंकि सूर्य— दिखाई देता है,अनुभव होता है,जीवन देता है, और प्रतिदिन नया
आरंभ करता है। इसलिए मानव सभ्यताएँ सूर्य को "दृष्ट देव" (visible God) मानती आई हैं।
मग धर्म संसद – स्थापना से लेकर आजतक
जब देश में महात्मा गाँधी का आगमन हो चुका था, सम्पूर्ण देश में अपने तरीके से देश सेवा के लिए तमाम संगठन
रूपाकार हो रहे थे उसी समय सन १९१८ में मगध क्षेत्र के विद्वान एवं धर्मप्रेमी सामाजिक मार्गदर्शकों में
स्वतंत्रता सेनानी पं.यदुनंदन शर्मा, पं.जानकीवल्लभ पाठक, एवं प.यदुवीर पाठक सहित अन्य लोगों ने “मग धर्म संसद”
की स्थापना इस संकल्प के साथ की कि—देश की आजादी के सहयोग के साथ समाज में धर्मसम्मेलन, वैदिक परंपरा, सामाजिक
एकता, और गठनात्मक अखंडता को बढ़ावा दिया जाए। उस समय समाज जातिगत विभाजन, संचार के अभाव और विभिन्न सामाजिक
चुनौतियों से घिरा था। मग धर्म संसद ने शिक्षा, संस्कार और वैदिक संस्कृति को केंद्र में रखते हुए गाँव–गाँव और
नगर–नगर धर्म सम्मेलनों का आयोजन किया। कालांतर में मग धर्म संसद पुनः इन सौ वर्षों में मग धर्म संसद ने समाज को
यह विश्वास दिलाया कि - “एकता ही शक्ति है।” सन २०१९ फिलोसोफिकल रिसर्च कौंसिल के साथ आधुनिक प्रौद्योगिकी के
सहयोग से एवं सरकार द्वारा पंजीकृत हो पुनर्प्रतिष्ठापक आचार्य शैलेश पराशर जी को मग धर्म संसद का निदेशक पदभार
सौंपा गया। वर्तमान समय में आ.शैलेश पराशर (अधिवक्ता) निदेशक तथा कमलाकान्त पाठक (अभियंता) सचिव ने पुनः प्राण
फूंक दिया। आचार्य शैलेश एवं कमलाकान्त पाठक ने संगठन में — फिलोसोफिकल रिसर्च कौंसिल के कुशल नेतृत्व में
डिजिटल संचार, पारदर्शी प्रबंधन, युवाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा दिया। समस्त सौर उपासकों ने अपना असीम
स्नेह से मग धर्म संसद को स्थानीय से राष्ट्रीय मंच पर पहुँचाया। आप समस्त दिव्य जनो के सौर उपासना पुनर्स्थापित
हो सकी है और उत्तरोत्तर इसकी रश्मि का प्रकाश फैलता जा रहा है।
मुख्य उपलब्धियाँ
1. गया (बिहार) – मगध की आध्यात्मिक राजधानी में तीन बार सम्मेलन, सूर्योपासना और वैदिक परंपरा पर आधारित
सम्मेलनों का आयोजन।मगध क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित किया। पूरे मगध में समाज को संगठनात्मक रूप
मिला।
2. पटना – प्रशासनिक एवं बौद्धिक नेतृत्व का केंद्र बड़ी संख्या में विद्वानों, समाजसेवियों और धार्मिक नेतृत्व
की सहभागिता। सामाजिक समन्वय, रणनीति और संगठन की आधुनिक रूपरेखा बनी।
3. काशी (वाराणसी) – वैदिक संस्कृति से पुनर्संपर्क विश्व की प्राचीनतम ज्ञान नगरी में सम्मेलन। काशी विश्वनाथ
धाम और सनातन विद्वानों से विचार-संवाद। ‘मगध की वैदिक जड़ों’ को वैश्विक मंच मिला।
4. अयोध्या – अध्यात्म और राष्ट्रधर्म का संगम राम नगरी में सम्मेलन आयोजित, रामत्व और अध्यात्म का संदेश। मग
समाज के प्रतिनिधियों ने पहली बार अयोध्या में अपनी पहचान दर्ज कराई।
5. ब्रजधाम – प्रेम, भक्ति और संस्कृति का केंद्र 2026 में ब्रजधाम में सौर धर्म यज्ञोत्सव और धर्म-सम्मेलन की
रूपरेखा। ब्रज की भूमि पर प्रथम बार मग समाज और सौर धर्म का विराट संगम होगा।
संगठनात्मक परिवर्तन निदेशक आचार्य शैलेश के नेतृत्व में सीमित क्षेत्र व सीमित लोग सर्वधर्म–सर्वसमाज तक
विस्तार पारंपरिक व्यवस्था आधुनिक + पारदर्शी प्रबंधन पहचान कम राष्ट्रीय स्तर पर पहचान केवल सम्मेलन सम्मेलन +
सेवा + संस्कार + संगठन आज मग धर्म संसद – “वैदिक संस्कृति + आधुनिक संगठन”
का उत्कृष्ट मॉडल बन चुका है। मुख्य ध्येय वाक्य- “हम एक हैं – मग हमारा परिवार है।”
आधुनिक मिशन-सूर्य धर्म और गायत्री परम्परा को वैदिक स्वरूप में स्थापित करना। संस्कार आधारित शिक्षा – सेवा –
संगठन मॉडल विकसित करना।मग समाज को राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय मंच पर एकसूत्र में जोड़ना। १९१८ की शुरुआत से लेकर
आज तक मग धर्म संसद ने समाज को जोड़ा है।मग समाज को प्रतिष्ठित किया है।